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apne apne hote hain....

आज फिर एक बार ज़ख्मो को हरा किया गया,
दबाये बैठे थे जिन्हे ख़ुशी की चादर तले, उन्हें फिर उभरने का मौका मिल गया। 
ये ज़माना भी बड़ा खुदगर्ज़ हो गया,
पराये तो पराये, अपने ख़ास को भी दूर कर गया। 
सोचा था ज़माने के साथ हम भी दौड़ लेंगे,
मगर ये ज़माना इतना नासूर हो जाएगा, कभी सोचा न था गया। 
इस ज़माने में मैं तो एक मज़ाक बन कर रह गया, हंसी का पुतला बन कर रह गया,
जब कभी लगा क मौका है अब सुधरने का, दुनिया ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। 
गिर पड़े थे जब चोट खाकर, 
समुद्र की तरह लहू बह गया। 
गैरों से लया उम्मीद करते,
अपनों का ही हाथ हमेशा की आगे आगे बढ़ा गया। 
हालात सीख तो कई दे गए, लेकिन अपने अपने और पराये पराये होते हैं,
इसका एहसास करा गए।

Pushkin Channan...

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