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Before its too late....

ज़िन्दगी से आज मैंने एक सवाल किया,
क्या था मेरा गुनाह जो इस मोड़ पर ल खड़ा किया। 
ठोकर खाकर, दुनिया से सुनकर यहाँ आ गया,
गिला करता भी तोह किससे, यहाँ सभी को गैर बना दिया। 
ऐसी ज़िन्दगी ने मुझे कठोर बना दिया,
अपनों और गैरों को पहचानने का हुनर सीखा दिया। 
गिरने पर जो हाथ आगे बढ़े, वो अक्सर अपने हुए,
गैरों को अक्सर देखा मैंने हँसते हुए। 
                 फिर ज़िन्दगी ने एक दोस्त से मिलाया,
                 बोला, ले आ गया तेरे ख़ुशी का पिटारा।
                 किस्मत से मिले उस दोस्त की कदर तो मैंने बहुत की,
                  जब कभी चोट आई, मेरी हमेशा मौजूदगी रही।
                  वो अलग बात है के उसने मेरी मदद नहीं ली,
                  उस दोस्त को हमने दिल में बसा लिया।
                  जब कभी परेशानी हुई, उसने हमेशा साथ दिया।
                  माँ-बाप की तरह हमेशा मेरे साथ रहा।
                  ये आदत इतनी बुरी हो जाएगी कभी सोच न था,
                  के बिन उसके रहना मुश्किल हो जाएगा।
फिर मैंने भी दूरियाँ बनाने की ठान ली,
सोचा आज अगर जो है कल हो ना हो तोह मेरा क्या हो?
लेकिन फिर लगा के नहीं, जब तक जैसा है वैसा चलने दो ,
किस्मत का लिखा कौन ताल पाया है भला??
                   फिर ज़िन्दगी से मैंने कहा, के
                   अब नहीं करूँगा तुझसे गेम-ए-दिल बयान
                   क्योंकि ज़िन्दगी के हर लम्हे को ख़ास भी तो तूने ही बनाया है।

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